बैंक वालो की व्यथा तुम क्या जानोगे, रमेश बाबु???

भारत में यदि कोई स्थान धर्म, जाति, वर्ण, लिंग ,आदि के भेदभाव से परे है, तो वह है बैंक, खासतौर से सरकारी बैंक। आप कोई भी हो, हिन्दू या मुसलमान, आदमी या औरत, ब्राह्मण अथवा शुद्र, बैंक और बैंक कर्मचारी आप सभी को हिकारत की नजर से ही देखते है (फिर से याद दिला दूँ, सिर्फ सरकारी बैंक; प्राइवेट बैंक वाले तो आपके इंतज़ार में पलक पाँवड़े बिछाये रहते है, कि नया गधा मतलब ग्राहक कब टारगेट पूरे करने का मौका देगा)। 

तो साब, बैंक वाले आपको हिकारत की नज़र से देखते  है और उनका हक़ भी बनता है की वह आपको हिकारत से देखे। आखिर आप उनके घर-संसार की परेशानियों से दूर एयर कंडीशनर की शिमला को मात देने वाले सुकून के पलों को नष्ट करने जो आ गए है। और वह भी क्यों, पासबुक में एंट्री करना है, SSC का फॉर्म भरना है, सेविंग्स अकाउंट में सालों से जमा कटी हुई रेजगारी निकालनी है। अरे भाई, इतने ATM किसलिए है, वहां से अपना बैलेंस जांच लो (आजकल तो बैंक आपके मोबाइल पर है, एक स्मार्ट फ़ोन ही खरीद लो)। आए तो ऐसे हो, जैसे टाटा- बिड़ला के खानदान से हो, पैसा निकालना है 500 रुपए और निकले ऐसे हो जैसे आज पूरा मॉल ही खरीद लोगे!! SSC का फॉर्म भर भी दोगे तो कोनसा उत्तीर्ण हो जाओगे, और गलती से हो भी गए, तो बैंक वालों के कोनसा काम आ जाओगे?? आ गए मुँह उठाये, बेचारे भले मानुष को परेशान करने! बीवी-बच्चों की जली कटी, माँ बाप की डाँट सुनकर आए आदमी को चैन से भी जीने नहीं दोगे; घर में पति और बच्चों की झिकझिक से परेशान औरत को स्वेटर नहीं बुनने दोगे, नेलपॉलिश का नया शेड नहीं लगाने दोगे, सेल कहाँ चल रही है, इसके बारे में अपने बगल में बैठी अपने जितनी ही कर्त्तव्यनिष्ठ महिला से नहीं जानने दोगे?? 

नहीं, आपको तो अपने नोटों की भीषण कमी से जूझते बैंक खाते के साथ खेल करना है। हाँ, हाँ, वही खाता जिसको गांधीजी की तस्वीर वाले नोटों की उतनी ही जरुरत है जितनी ICU में भर्ती दिल की बीमारी के मरीज़ को ऑक्सीजन की। सही में यार, आपसे मतलबी इंसान नहीं देखा। मतलब खुद बैंक में नहीं लग पाये, तो आ गए अपनी खुन्नस निकालने एक सीधे साधे मनुष्य पर। 

इतना ही शौक था, तो कुछ अच्छा कमा लेते जिंदगी में!! प्राइवेट बैंक, लोन देने वाली संस्थाओ, म्यूच्यूअल फण्ड और इन्शुरन्स बेचने वाली कंपनियों के कर्मचारियों की कतार लग जाती घर के आगे, दिन भर फोन उठा उठाकर थक जाते। नहीं साहब, हम तो डेमोक्रेसी में है, साथी भारतीय का खून जलाने का fundamental right अर्थात मौलिक अधिकार जो प्रदान किया है हमें भारतीय संविधान ने।

अभी ज्यादा समय भी नहीं हुआ, हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने नोट बंदी का आदेश दिया था। उन्होंने तो आदेश दे दिया था, यहाँ कतारें लग गयी थी बैंक के आगे। दिन भर सुस्ताने वाले, मेरा मतलब सुगम तरीके से बैंक चलाने वाले बेचारे बैंक कर्मचारी पूरा दिन कतार सँभालने, गार्ड को समझाने और लोगों को डाँटने में व्यस्त थे। इस सब के बाद उनको नए नोट भी बांटने थे, पुराने नोट की गिनती करने के बाद सॉफ्टवेयर में एंट्री करनी थी, किस ATM को भरना है, और किसको खाली रखना है, अपने कौन से रिश्तेदार और मित्र के नोट बदलने है, इस की जानकारी भी रखनी थी। ऊपर से रिज़र्व बैंक के समुद्र की लहरों से भी तेजी से ऊपर नीचे आते नियमों का दबाव अलगइन सब के बीच कितना शारीरक और मानसिक तनाव इन लोगों ने झेला, आप कल्पना भी नहीं कर सकते। आप तो बस गाली देते है की बैंक वाले कामचोर है, हमारा काम समय पर नहीं करते। इस से ज्यादा खुदगर्ज़ी और क्या हो सकती है??

बैंक वाले और भी चीज़ों से परेशान है, मसलन ट्रासंफर हो जाने का डर, पदोन्नति ना होने का डर (प्राइवेट वालों को तो नौकरी जाने का डर भी) आप तो बेरोज़गार है, आपको क्या डर, आप तो सुरसा जैसा मुख खोले चले आये बैंक में।

इन सब के बीच एक सबसे बड़ा डर और होता है, और  वो है, सर्वर का कनेक्शन बंद हो जाने का डर। लंबी सी कतार लगी है, और इंटरनेट कनेक्टिविटी गयी, सर्वर बंद, काम ठप्प!! अब क्या, आप खाओ गाली लाइन में लगे लोगों से। अरे भाई, उस गरीब की क्या गलती, इंटरनेट नहीं चल रहा। कभी कभी मन होता है, आगे बढ़कर बैंक के सर्वर को अपने मोबाइल से हॉटस्पॉट बनाकर दे दूँ; काम तो नहीं रुकेगा (वैसे भी अम्बानी जी की दया और दुआ से फ्री इंटरनेट चल रहा है JIO की सिम से, थोड़ा सा परमार्थ में काम आ जायेगा, दिन भर फेसबुक, व्हाट्सएप्प से कोनसा नोबल पुरस्कार मिल गया??)

फिर याद आता है, में क्या रईस बन रहा हूँ, बचत खाते में सब कुछ है, पासबुक, ATM कार्ड, चेकबुक; बस बचत नहीं हैं। घर के लोन की क़िस्त भरनी है और यह कमबख्त तनख्वाह अभी तक आई नहीं, और में बड़ा तुर्रमखां बन रहा हूँ, सर्वर चलाऊँगा।

खेर इजाजत दीजिये, बैंक बंद हो जायेगा, पासबुक में एंट्री करवानी है।

फिर मिलेंगे।।।

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