स्वच्छ भारत: एक कपोल कल्पना

शहर में आजकल उठने के लिए लोगों ने नया तरीका खोज लिया है। पहले लोग orpat के अलार्म क्लॉक से उठ जाते थे। अलार्म क्लॉक क्या था, लाउडस्पीकर था। पूरा मोहल्ला सुबह 4-5 बजे अलार्म लगाने वाले को माँ-बहन वाले विशेष सन्दर्भों से नवाजता था। अलार्म भी बंद करना अपने आप में एक जंग जीतने जैसा था, छोटा सा काले रंग का खटका, जिसे भरी नींद में ढूँढना एवेरेस्ट फ़तह करने से कम नहीं था। फिर आये मोबाइल के नाजुक वाले अलार्म जिनके मधुर संगीत से नींद खुलती नहीं, और गहरी हो जाती है। और snooze के ऑप्शन ने तो इसे और ज्यादा नाकारा बना दिया। खेर, चर्चा का विषय अलार्म नहीं था। राह से भटकने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

तो आजकल शहर वासियों की नींद तोड़ने के लिए नगर निगम ने नया साधन काम पर लगाया है। कचरा इकट्ठा करने वाली गाड़ियों पर कानफोड़ू स्तर की आवाज़ में कैलाश खेर की सूफ़ियाना आवाज़ में “स्वच्छ भारत का इरादा कर लिया हमने” या शान की खनखनाती आवाज़ में ” हल्ला हो हल्ला” का  संगीत तब तक बजाया जाता है, जब तक आपके घर में सोता हर इंसान उठ कर अपनी दैनिक क्रियाओं में नहीं लग जाता। रामायण काल में यह संगीत बजाते तो कुम्भकर्ण 6 महीने क्या, 6 मिनट भी नहीं सो पाता।

इन गाड़ियों का वैसे प्रमुख कर्त्तव्य था, कचरा उठाना। पर अब इनका ध्येय एक ही है, शहर वासियो का अलार्म की बैटरी का खर्च कम करना। सफाई तो शहर में पहले भी नहीं थी, तो लोगों की गंदगी में रहने की आदत को बदल कर क्या फायदा?? भरी हुई नालियों, खुदी और कीचड़ से सनी हुई सड़को, कचरे के डब्बों के आसपास पड़े हुए कचरे के ऊपर भिनभिनाते हुए मक्खी मच्छर यदि लोगों को नहीं दिखेंगे, तो लोग स्वस्थ कैसे रहेंगे? खुदा-ना-खास्ता कभी नाली साफ़ हो भी जाती है, तो नाली की गाद को रोड पर ऐसे सजाया जाता है, जैसे टीम इंडिया विश्वकप जीतकर लौटी हो!!! गाड़ियाँ भले ही कचरा हर जगह फैलाती हुई जा रही हो, अगर गलती से कोई महानुभाव कचरा फेंकते हुए दिख जाते है, तो चालान बनाने में अपने कार्य में चुस्त निगम कर्मचारी कोताही नहीं बरतते। नगर निगम के कर्मचारी आपके घर आपको रसीद देने भी आएँगे की हम शहर साफ़ कर रहे है और गाना भी सुना रहे है, तो भले ही आप 36 तरह के टैक्स भर भर के मरने वाले हो, यह रसीद तो आपको देना पड़ेगी।

उसके ऊपर से हर जगह बड़े बड़े बैनरों को लगाकर यह बताया जाता है की आपका शहर साफ़ हो रहा हैं, कृपया स्वच्छता सर्वेक्षण के लिए कॉल करे और शहर को नंबर 1 बनाये (बैनर लगाने से तो शहर बड़ा साफ़ दिखता है ना जैसे 😑)
अगर कोई मेरे जैसा ट्विटर और फेसबुक प्रेमी इस गंदगी की तस्वीरें ले कर सोशल मीडिया पर लगाकर कलेक्टर या महापौर को टैग कर भी देता है, तो उसे ऐसे नजरअंदाज किया जाता है, जैसे लोग वोट देते वक़्त निर्दलीय प्रत्याशी को कर देते है (साला, इस बार तो उसे ही वोट देने वाला हूँ; काम करे या नहीं, संतुष्टि तो रहेगी की जिनको इतनी आस से वोट दिया, उनकी तरह बेवकूफ़ तो नहीं बना रहा है)। अरे भाई, डिजीटल इंडिया के नाम पर कम से कम इतना तो हक़ बनता है की हमारे चुने हुए प्रत्याशी या सरकारी सेवक सोशल मीडिया पर हमारी बात तो सुन ले, काम करे या नहीं, वह अलग बात है।
तो कुल मिलकर अर्थ यह है कि नगर निगम आपके स्वास्थ्य का बहुत ध्यान रखता है; कचरा उठाकर नहीं, बल्कि आपको सुबह सुबह उठाकर जिससे आप सही समय पर नाश्ता करें, और सही समय पर अपनी बीवी और बॉस के प्यारे अपशब्द सुन सके।

 
जहाँ तक स्वच्छ भारत का सवाल है,
मेरा देश बदल रहा है, सुधरेगा की नहीं, पता नहीं“🤔🤔

राम राम भिया।।
🙏🙏🙏

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