लोकतंत्र का गणतंत्र

​26 जनवरी तारीख फिर से आ गयी है, यानी हमारा गणतंत्र दिवस। साल का वह समय जब फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप्प पर फ़र्जी देशभक्तो की भीड़ आ जाती है (यह अलग बात है, इनमे से 90 प्रतिशत को यह नहीं पता की आज स्वतंत्रता नहीं मिली थी; देश आजाद नहीं हुआ था, पर इन महान आत्माओं को समझाना अपने नाजुक से दिमाग को हानि पहुँचाना है)। आपकी टाइम लाइन पर, मेसेज बॉक्स में, दिन भर देशभक्ति के इतने पैगाम आते है की लगता है बस आज ही देश हमारा सबसे ज्यादा प्रगति कर गया है, हर नागरिक सबसे बड़ा देशभक्त है, और आज के बाद सब समस्या खत्म हो जायेगी। हर आदमी खुद को देश का सबसे समझदार और जिम्मेदार नागरिक साबित करने पर तुल जाता है (भले ही देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति में फर्क नहीं पता हो)।😑😑😑

जगह जगह छुटभैये नेता और समाजसेवी झंडा रोपण करने के लिए अच्छी खासी रोड पर गड्डा कर देते है, बिजली के पोल से लाइट चुराकर बड़े बड़े लाऊडस्पीकर लगाकर ध्वनि प्रदुषण में अपना पूरा योगदान देते है और नाश्ता चाय के डिस्पोजेबल बर्तन से गंदगी फैलाकर गणतंत्र दिवस के अपने कर्त्तव्य को सार्थक करते है। कुछ दिन तक अपने इस महान कार्य की लोगो को याद दिलाने के लिए फ़ोटो एल्बम दिखाते है, और आजकल तो फेसबुक भी है, लाइक भी मिलते है, कमेंट भी और देशभक्ति का टैग भी।
जगह जगह टीवी चैनल पर विशेषज्ञ बैठ जाते है, जो बताते है देश ने आज़ादी के बाद कितनी तरक्की करी, कितने लोग अशिक्षित है, कितने बेरोज़गार, और इस सबका क्या निदान है? इनमे से कितनो को झंडे के रंग का क्रम नहीं पता, अशोक चक्र की धारियों की गिनती नहीं मालूम, राष्ट्र गान और राष्ट्र गीत के रचयिता नहीं मालूम (अरे साहब वो छोड़िये, राष्ट्र गान गाते नहीं बनेगा), पर विशेषज्ञ है और इनकी विशेषताओं पर सवाल उठाना देश पर सवाल उठाना है, आपको तुरंत देशद्रोही घोषित किया जायेगा, और जो लोग आपको जानते तक नहीं, विशेष संभोदन (गालियों) से आपको नवाजित करेंगे,  और आप खुद को कोसेंगे की आपने अपना बड़ा सा मुँह खोला ही क्यूँ?? 😢😢

इन सबके बीच में बच्चे स्कूल वालो को कोसेंगे की आज छुट्टी नहीं दी, गणतंत्र दिवस मनाने बुला लिया। आजकल के बच्चों को स्कूल नहीं जाना, छुट्टी है, आज तो आउटिंग करना है, माल जाना है, नए iphone से सेल्फ़ी लेना है, आखिर फेसबुक वाली नयी दोस्त का रिएक्शन चाहिए, “oh so cute, u r lookin cute dear, aww aww“….

एक हम लोग थे स्कूल जाते थे, मोतीचूर के दो लड्डू मिलेगे, झण्डा फेहराया जायेगा, 1 रुपए का तिरंगा लेंगे, उसे दिन भर लोगो को दिखायेगे और घर के कोने में लगा देगे, और अगर किस्मत ज्यादा चमकी तो झंडे वाला बैज यूनिफार्म पर लगा कर घूमेंगे, उन दिनों के भी क्या जलवे थे!!!

पर इन सबके बीच उस इंसान का क्या, जिसे आज भी छत और दो वक़्त की रोटी नसीब नहीं, जो 3 महीने ठण्ड में ठिठुरा, और अब गर्मी में पसीने में जी तोड़ मेहनत करेगा, ताकि उसके बच्चे भूख से नहीं बिलबिलाये, उसके लिए क्या गणतंत्र और क्या स्वतंत्रता दिवस, उसको इन विश्लेषणों से क्या लेना देना?? उसके बच्चे स्कूल के बाहर खड़े होकर अपने हमउम्र बच्चों के साफ़ चमकदार कपड़े, उनके हाथों में मिठाई देखकर आहें भरेंगे। (लो में भी अब खुद को विशेषज्ञ समझने लगा)
इतना लिखने के पीछे सिर्फ इतना कहना था की अपनी देशभक्ती को सिर्फ साल में 2 दिन के लिए जगाने की जगह अपने काम को साल भर ईमानदारी से कर ले, तो देश का ज्यादा भला होगा, नहीं तो बेगारी काटना कोनसा कठिन काम है, बकवास करते रहिए, इस महान देश की सहिष्णु जनता तो सालों से सब सहती आ ही रही है, आपको भी सह लेगी।

सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा…

।।वंदे मातरम।।

HAPPY INDEPENDENCE, errrrr


HAPPY REPUBLIC DAY…

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